धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में पारंपरिक त्योहारों की झलक हर मौसम में देखने को मिलती है। इन्हीं परंपराओं में शामिल है नवाखाई पर्व, जिसे बस्तर संभाग और आदिवासी अंचलों में बड़ी आस्था और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। धान की फसल में बालियां आने के साथ ही ग्रामीणों ने खेत से नया धान लाकर घरों में पूजा अर्चना की और कुल देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के बाद पहली बार नये चावल से बने पकवानों का सेवन किया।
आज के दिन गांव में लोग एक साथ बैठकर छत्तीसगढ़ी व्यंजन का स्वाद चखते नज़र आए। ग्रामीणों ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसे वे पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। इस अवसर पर परिवार और गांव के लोग एकत्र होकर न केवल देवताओं को धन्यवाद देते हैं बल्कि आपसी भाईचारा और एकजुटता का संदेश भी फैलाते हैं।
नवाखाई पर्व खेती-किसानी से गहराई से जुड़ा हुआ है। धान की रोपाई से लेकर फसल कटने तक किसान अलग-अलग मौकों पर पर्व और उत्सव मनाते हैं। इन्हीं में से एक है यह त्योहार, जो अच्छी बारिश और पैदावार की आशा से जुड़ा होता है।
ग्रामीण पूजारी प्रताप सिंह ने बताया कि नवाखाई के दिन खेत से लाई गई पहली बालियों को देवताओं को अर्पित किया जाता है, जिसके बाद घर के लोग मिलकर भोजन ग्रहण करते हैं। वहीं, प्रेम सिंह पोया जैसे स्थानीय ग्रामीणों ने कहा कि यह पर्व गांव की संस्कृति और एकता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। नवाखाई सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी, संस्कृति और विश्वास का प्रतीक है।

बस्तर में परंपरा और आस्था संग मनाया गया नवाखाई पर्व, धान की पहली बाली देवी-देवताओं और पुरखों को अर्पित
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